चश्मे का नंबर कैसे चेक करते है
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दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए “चश्मा” जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। ऐसे व्यक्ति का जीवन चश्मे के बिना अधूरा होगा, इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि चश्मा बनवाने के लिए किसे क्या सावधानी बरतनी चाहिए और आंखों की जांच कैसे करानी चाहिए।
इस वीडियो के माध्यम से पिछले 42 वर्षों से नेत्र विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रहे डॉ. पटवर्धन के “नंदादीप आई हॉस्पिटल” के डॉ. सौरभ पटवर्धन ने नेत्र परीक्षण करते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए तथा नेत्र परीक्षण किसे कराना चाहिए, इस पर मार्गदर्शन दिया।
Dr. Saurabh Patwardhan gives information about the scientific method used while doing eye examination and other tests used to get the number of eyes accurately i.e. auto refractometer, retinoscopy, subjective and objective test, fogging method, green and red light test i.e. duochrome test, as well as balancing. Detailed guidance on how to perform eye examination using all methods.
Eye examination is a very important subject, so eye examination should be done only by an expert doctor (ophthalmologist) or optometrist so that the number of eyes is correct and the patient does not suffer any kind of problem in future.
👨⚕️ Why Watch This Video?
Whether you’re due for an eye exam or simply interested in understanding more about vision care, this video offers clear and informative guidance from Dr. Sourabh Patwardhan, ensuring you’re well-informed about the spectacles power testing process.
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Nandadeep Eye Hospital (नंदादीप नेत्रालय) is a Group of super-specialty eye care hospitals founded in 1980 with centers in Sangli, Kolhapur, Ratanagiri, Belagavi, Pune, Mumbai (Mulund) and Ichalkaranji with all advanced ophthalmic specialties available under one roof.
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Transcript :-
आज इस वीडियो मैं आपको बताने वाला हूँ कि आँख का नंबर कैसे चेक करवाते हैं. इसके बारे में जो साइंटिफिक knowledge है, उसके बारे मैं इस वीडियो में आपको बताने वाला हूँ. आपने कही जगह देखा होगा, लिखा जाता है कि कंप्यूटर के थ्रू नंबर चेकअप होता है. तो ये कॉमन लैंग्वेज में हम कंप्यूटर बोलते हैं, लेकिन इसी मशीन को हम ऑटो रिफ्रेक्टोमीटर बोलते हैं तो हम यहाँ पे देखेंगे कि वो कैसे चेक होता है.ऑटो रिफ्रेक्टोमीटर के बहुत सारे Different Types हैं। इसमें सबसे Best जो है वो Abrometer based ऑटो रिफ्रेक्टोमीटर है जो हम यहाँ पे use कर रहे हैं, आप स्क्रीन पे वहां देखेंगे कि इस पेशंट का, इस व्यक्ति का ये नंबर जो है, ये मशीन जब वो मेजर करता है, तो वो दिखाता है, स्क्रीन पे इसमें multiple readings भी लिए जाते हैं, और उसके द्वारा हमें around ninety five परसेंट accurate नंबर मिल सकता है, लेकिन of course वो 100% नहीं होता, क्योंकि जो मशीन बताता है, नंबर वो actually उस व्यक्ति को सूट होता है कि नहीं, उसमें कुछ modifications करने चाहिए क्या? ये जानना बहुत जरुरी होता है क्योंकि पेशंट का Vision और comfort ये दोनों चीजें वो चश्मे के नंबर के ऊपर निर्धारित होते हैं तो हम वो भी दिखाएंगे अभी कि हम वो चश्मे का नंबर कैसे चेक करते हैं? और अभी ये हमें नंबर तो मिल गया है चश्मे का ऑटो Refractometer द्वारा अभी हम लोग ये दिखाएंगे ये व्यक्ति को जब हम ट्रायल फ्रेम लगाते हैं तो ये होता है ट्रायल फ्रेम अह जिसमें हम Different टाइप के lenses आते हैं वो हम लगाते हैं नंबर चेक करने का Process है वो या तो Ophthalmologist मतलब आँख के डॉक्टर वो कर सकते हैं या Optometrist मतलब जिन्होंने इस विषय पे स्पेशलाइजेशन किया हैं इनको हम Optometrist बोलते है इस नंबर check up का स्पेशलायझेशन करते है नंबर चेक करने से पहिले Retinoscopy का Procedure रहता है जैसे ऑटो रिफ्रेक्टो रहता हैं वैसे ही ये procedure है लेकिन ये Manual है और उसमें पेशेंट का Dynamic मतलब कई बार हम मशीन पे बैठते हैं तो उस टाइम अलग-अलग readings आते हैं क्योंकि पेशेंट का आँख कई-कई बार Relax होता है कई बार वो Relax नहीं होता है तो ऐसे केस में पेशेंट को ज्यादा Relax करके हम Retinoscopy करते हैं Retinoscopy बहुत जरुरी है खास करके बच्चों के लिए Because कई बार बच्चे बराबर नंबर नहीं बता पाते इस ऐसे वक्त जो Ophthalmologist होते हैं वह Retinoscopy से Accurate नंबर diagnosis करते हैं नंबर करना ही पड़ता है ऐसे नहीं है तो कई बार हम directly trial set से हम trial frame लगा के हम लोग नंबर चेक करते हैं of course ये retinoscopy का विधि भी काफी जरूरी है खास करके अन्य कोई चीजें जैसे अन्य कोई बीमारी होती है जैसे मोतियाबिंद होता है या पुतली पे कुछ सफेदी होती है वो चेक करने के लिए भी ये एटिनोस्कोपी बहुत ज्यादा useful होती है अभी हम देखेंगे कि ये नंबर अभी कैसे चेक होता है तो इसमें आप देखेंगे पहले सबसे पहले हम एक-एक आँख का नंबर चेक होता है जिसमें ट्रायल सेट्स अलग-अलग नंबर से हम डालते हैं पेशेंट को और पेशेंट को बताने के लिए बोलते हैं कि इसमें से कौन सा better लग रहा है तो कई बार आप अह गए होंगे नंबर चेक कराने के लिए तो आपको वो पूछेंगे कि ये better है या ये better है ये होता है सब्जेक्ट मतलब पेशेंट को या व्यक्ति को किस से अच्छा दिख रहा है. ये बहुत इम्पोर्टेन्ट है क्योंकि मशीन से या कंप्यूटर से जो भी नंबर निकाला हुआ है वो एक्चुअल में रियल लाइफ में कितना कम्फर्टेबल है वो देखने के लिए ये बहुत जरूरी होता है. इससे जो नंबर है वो फाइन ट्यून होता है. तो आप देखेंगे कि ये इसमें कैसे चेक करते हैं. तो इसमें सामने एक विजन चार्ट लगाया होता है. जिसमें डिफरेंट टाइप के विजन जिसमें कम से कम विजन जो होता है वो सिक्स बाय सिक्स ही या उससे भी कम होता है हम ये चार्ट देख रहे हैं अभी और जो अच्छा विज़न माना जाता है वो सिक्स बाय सिक्स होता है. तो कुछ लोगों का ऑफकोर्स विजन उससे ज्यादा भी जैसे सिक्स बाय फोर भी हो सकता है कुछ लोगों का थोड़ा सा कम भी हो सकता है सिक्स बाय नाइन या सिक्स बाय ट्वेल भी हो सकता है लेकिन उस व्यक्ति के लिए कौन सा दृष्टी सबसे अच्छा आ रहा है इसका कोशिश हम चश्मे के नंबर चेकअप के दौरान करते हैं. इसमें पेशेंट का स्पेरिकल एज वेल है दोनों नंबर किए जाते हैं. जो व्यक्ति चालीस के उम्र के से ज्यादा है. या कभी-कभी उससे कम भी होता है उम्र तो उनको कभी-कभी नजदीक का देखने में तकलीफ होता है. तो वो देखने के लिए हम नजदीक का नंबर भी चेक करते हैं नियर चैट द्वारा. दूसरी बहुत important चीज है जो हम check करते हैं जब हम ये checkup करते हैं तो वो होता है fogging. Fogging में हम patient की आँख को ज्यादा relax करते हैं. ये बहुत ही scientific technique है जो सिर्फ specialized जो सीखे हुए optometrist है. Specialized optometrics या से वो use करते हैं. लेकिन ये बहुत important चीज है क्योंकि आँख को relax किए बिना अगर हम चश्मे का नंबर देंगे. तो उसके बाद व्यक्तियों को हेड एक होना या तकलीफ होना, थकावट आना जैसे कई बार होता है कि नंबर हमने चेंज किया और ज्यादा थकान हो रही है ये कई बार इसकी वजह से हो सकता है कि जो नंबर है उससे हमने कई ज्यादा या कम दिया होगा तो इसमें ये फोगिंग टेस्ट का यूज होता है और भी कई सारे टेस्ट है जिसमें रेड ग्रीन जैसे डिओक्रोम टेस्ट बोलते हैं हम उसमें हम क्या करते हैं कि पेशेंट का जो फाइन ट्यूनिंग है हमने नंबर तो निकाल दिया लेकिन उसमें पॉइंट टू फाइव का थोड़ा बहुत भी चेंज हमें अगर लग रहा है तो उसमें हम डिओक्रोम टेस्ट करके पेशेंट का फाइन जो विजन है वो हम चेक करा लेते हैं. ये सब होने के बाद सबसे इंपॉर्टेंट चीज है दोनों आँखों में बैलेंस तो ये आखिरी टेस्ट होता है जिसमें हम ये चेक करते हैं कि पेशंट का दोनों आँखें बराबर देख रहे हैं कि नहीं कई बार एक-एक आँख से तो पेशंट को अच्छा दिखता है लेकिन हम ये बैलेंसिंग टेस्ट नहीं करेंगे तो क्या होता है पेशंट जब चश्मा बनाता है. उसके बाद उसको तकलीफ होना चालू होता है. तो एक-एक आँख से तो हम वो पेशंट आता है वापिस हम देखते हैं कि एक-एक आँख से तो अच्छा पड़ रहा है. लेकिन कई बार दोनों आँखों का बैलेंस ना होने की वजह से पेशेंट को तकलीफ हो सकता है तो आज के इस वीडियो में आपने देखा होगा कि चश्मा का नंबर निकालना ये वैसे तो हमें लगता है कि बहुत ही सीधा या साधा सा प्रोसेस है लेकिन इसके पीछे भी एक साइंस है तो ये बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि जिस व्यक्ति को भी चश्मे का जरूरत होता है उनको एक्यूरेट नंबर यूज करना बहुत जरूरी है क्योंकि जरा भी नंबर में चेंज होता है तो आपको उसका असर आपके काम पे हो सकता है थकावट सिर दर्द होना चालू हो सकता है और कई बार हम इसके लिए अलग-अलग डॉक्टर्स की राय लेते हैं दिखाते हैं कि मेरा headache क्यों हो रहा है थकान क्यों हो रही है और कई बार उसका कारण होता है चश्मे का नंबर तो चश्मे का नंबर निकालना ये एक साइंटिफिक प्रोसेस है और ये कोई साधा प्रोसेस नहीं है इसके लिए स्पेशलाइज और वेल ट्रेंड ऑप्टोमेट्री कैसे बनाया जाता है और कैसे बनाना चाहिए जिससे हमें hundred percent vision आ जाए
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